वाल्मीकि रामायण 6.86.3
अस्यानीकस्य महतो भेदने यत लक्ष्मण।राक्षसेन्द्रसुतो ऽप्यत्र भिन्ने दृश्यो भविष्यति॥
asyānīkasya mahato bhedane yata lakṣmaṇa |rākṣasendrasuto 'pyatra bhinne dṛśyo bhaviṣyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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