वाल्मीकि रामायण 6.86.7
ऋक्षाः शाखामृगाश्चापि द्रुमाद्रिनखयोधिनः।अभ्यधावन्त सहितास्तदनीकमवस्थितम्॥
ṛkṣāḥ śākhāmṛgāścāpi drumādrinakhayodhinaḥ |abhyadhāvanta sahitāstadanīkamavasthitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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