वाल्मीकि रामायण 6.88.14
स त्वमर्थस्य हीनार्थो दुरवापस्य केनचित्।वचो व्याहृत्य जानीषे कृतार्थो ऽस्मीति दुर्मते॥
sa tvamarthasya hīnārtho duravāpasya kenacit |vaco vyāhṛtya jānīṣe kṛtārtho 'smīti durmate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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