वाल्मीकि रामायण 6.88.31
सुपत्रवाजिता बाणा ज्वलिता इव पन्नगाः।नैर्ऋतोरस्यभासन्त सवितू रश्मयो यथा॥
supatravājitā bāṇā jvalitā iva pannagāḥ |nairṛtorasyabhāsanta savitū raśmayo yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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