वाल्मीकि रामायण 6.89.38
बाणजालैः शरीरस्थैरवगाढैस्तरस्विनौ।शुशुभाते महावीर्यो प्ररूढाविव पर्वतौ॥
bāṇajālaiḥ śarīrasthairavagāḍhaistarasvinau |śuśubhāte mahāvīryo prarūḍhāviva parvatau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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