वाल्मीकि रामायण 6.90.48
विषण्णवदनं दृष्ट्वा राक्षसं हरियूथपाः।ततः परमसंहृष्टा लक्ष्मणं चाभ्यपूजयन्॥
viṣaṇṇavadanaṃ dṛṣṭvā rākṣasaṃ hariyūthapāḥ |tataḥ paramasaṃhṛṣṭā lakṣmaṇaṃ cābhyapūjayan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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