वाल्मीकि रामायण 6.91.21
स भिन्नवर्मा रुधिरं वमन् वक्त्रेण रावणिः।जग्राह कार्मुकश्रेष्ठं दृढज्यं बलवत्तरम्॥
sa bhinnavarmā rudhiraṃ vaman vaktreṇa rāvaṇiḥ |jagrāha kārmukaśreṣṭhaṃ dṛḍhajyaṃ balavattaram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें