वाल्मीकि रामायण 6.91.70
सन्धायामित्रदलनं विचकर्ष शरासनम्।सज्यमायम्य दुर्धर्षं कालो लोकक्षये यथा॥
sandhāyāmitradalanaṃ vicakarṣa śarāsanam |sajyamāyamya durdharṣaṃ kālo lokakṣaye yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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