वाल्मीकि रामायण 6.91.83
हतमिन्द्रजितं दृष्ट्वा शयानं समरक्षितौ।राक्षसानां सहस्रेषु न कश्चित् प्रत्यदृश्यत॥
hatamindrajitaṃ dṛṣṭvā śayānaṃ samarakṣitau |rākṣasānāṃ sahasreṣu na kaścit pratyadṛśyata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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