वाल्मीकि रामायण 6.92.7
श्रुत्वैतत्तु महावीर्यो लक्ष्मणेनेन्द्रजिद्वधम्।प्रहर्षमतुलं लेभे रामो वाक्यमुवाच ह॥
śrutvaitattu mahāvīryo lakṣmaṇenendrajidvadham |praharṣamatulaṃ lebhe rāmo vākyamuvāca ha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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