वाल्मीकि रामायण 6.95.16
जघान बलिनं रामः सहस्रनयनात्मजम्।वालिनं मेरुसङ्काशं पर्याप्तं तन्निदर्शनम्॥
jaghāna balinaṃ rāmaḥ sahasranayanātmajam |vālinaṃ merusaṅkāśaṃ paryāptaṃ tannidarśanam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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