वाल्मीकि रामायण 6.99.8
सर्क्षराजस्तु तेजस्वी नीलाञ्जनचयोपमः।निष्पत्य सुमहावीर्यः स्वाद्व्यूहान्मेघसन्निभात्॥
sarkṣarājastu tejasvī nīlāñjanacayopamaḥ |niṣpatya sumahāvīryaḥ svādvyūhānmeghasannibhāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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