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वाल्मीकि रामायण 7.1.38
अतिक्रम्य महावीर्यान् किं प्रशंसथ रावणिम्॥
atikramya mahāvīryān kiṃ praśaṃsatha rāvaṇim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंअतिक्रम्य महावीर्यान् किं प्रशंसथ रावणिम्॥
atikramya mahāvīryān kiṃ praśaṃsatha rāvaṇim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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