वाल्मीकि रामायण 7.100.15
सो ऽब्रवीद्राघवः प्रीतः साञ्जलिप्रग्रहो द्विजम् ।इमौ कुमारौ तं देशं ब्रह्मर्षे विचरिष्यतः॥
so 'bravīdrāghavaḥ prītaḥ sāñjalipragraho dvijam |imau kumārau taṃ deśaṃ brahmarṣe vicariṣyataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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