वाल्मीकि रामायण 7.100.16
भरतस्यात्मजौ वीरौ तक्षः पुष्कल एव च ।मातुलेन सुगुप्तौ तु धर्मेण सुसमाहितौ॥
bharatasyātmajau vīrau takṣaḥ puṣkala eva ca |mātulena suguptau tu dharmeṇa susamāhitau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें