वाल्मीकि रामायण 7.11.2
मारीचश्च प्रहस्तश्च विरूपाक्षो महोदरः ।उदतिष्ठन्सुसंरब्धाः सचिवास्तस्य रक्षसः॥
mārīcaśca prahastaśca virūpākṣo mahodaraḥ |udatiṣṭhansusaṃrabdhāḥ sacivāstasya rakṣasaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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