वाल्मीकि रामायण 7.110.14
ये च दिव्या ऋषिगणा गन्धर्वाप्सरसश्च याः ।सुपर्णनागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः॥
ye ca divyā ṛṣigaṇā gandharvāpsarasaśca yāḥ |suparṇanāgayakṣāśca daityadānavarākṣasāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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