वाल्मीकि रामायण 7.14.2
धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगृध्नुना ।वृतः संप्रययौ श्रीमान्क्रोधाल्लोकान्दहन्निव॥
dhūmrākṣeṇa ca vīreṇa nityaṃ samaragṛdhnunā |vṛtaḥ saṃprayayau śrīmānkrodhāllokāndahanniva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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