वाल्मीकि रामायण 7.14.23
ससञ्ज्ञस्तु मुहूर्तेन स विश्रम्य निशाचरः ।तं यक्षं योधयामास स च भग्नः प्रदुद्रुवे॥
sasañjñastu muhūrtena sa viśramya niśācaraḥ |taṃ yakṣaṃ yodhayāmāsa sa ca bhagnaḥ pradudruve ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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