वाल्मीकि रामायण 7.15.2
रावणं जहि यक्षेन्द्र दुर्वृत्तं पापचेतसम् ।शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम्॥
rāvaṇaṃ jahi yakṣendra durvṛttaṃ pāpacetasam |śaraṇaṃ bhava vīrāṇāṃ yakṣāṇāṃ yuddhaśālinām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें