वाल्मीकि रामायण 7.15.29
ततस्तेन दशग्रीवो यक्षेन्द्रेण महात्मना ।गदयाभिहतो मूर्ध्नि न च स्थानात्प्रकम्पितः॥
tatastena daśagrīvo yakṣendreṇa mahātmanā |gadayābhihato mūrdhni na ca sthānātprakampitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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