वाल्मीकि रामायण 7.15.42
निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम् ।न तु शीतं न चोष्णं च सर्वर्तुसुखदं शुभम्॥
nirmitaṃ sarvakāmaistu manoharamanuttamam |na tu śītaṃ na coṣṇaṃ ca sarvartusukhadaṃ śubham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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