वाल्मीकि रामायण 7.16.34
कृपालुः शङ्करस्तुष्टः प्रसादं ते विधास्यति ।एवमुक्तस्तदामात्यैस्तुष्टाव वृषभध्वजम्॥
kṛpāluḥ śaṅkarastuṣṭaḥ prasādaṃ te vidhāsyati |evamuktastadāmātyaistuṣṭāva vṛṣabhadhvajam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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