वाल्मीकि रामायण 7.16.50
अपरे दुर्जयं रक्षो जानन्तः प्राज्ञसम्मताः ।जिताः स्म इत्यभाषन्त राक्षसं बलदर्पितम्॥
apare durjayaṃ rakṣo jānantaḥ prājñasammatāḥ |jitāḥ sma ityabhāṣanta rākṣasaṃ baladarpitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें