वाल्मीकि रामायण 7.18.19
स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।विसृज्य सशरं चापं स्वस्थो मखमुखो ऽभवत्॥
sa nivṛtto gurorvākyānmaruttaḥ pṛthivīpatiḥ |visṛjya saśaraṃ cāpaṃ svastho makhamukho 'bhavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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