वाल्मीकि रामायण 7.18.32
मच्छरीरं समासाद्य कान्तो नित्यं भविष्यसि ।प्राप्स्यसे चातुलां प्रीतिमेतन्मे प्रीतिलक्षणम्॥
maccharīraṃ samāsādya kānto nityaṃ bhaviṣyasi |prāpsyase cātulāṃ prītimetanme prītilakṣaṇam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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