वाल्मीकि रामायण 7.20.22
तस्मादेवमहं ब्रह्मन् वैवस्वतवधोद्यतः ।गच्छामि दक्षिणामाशां यत्र सूर्यात्मजो नृपः॥
tasmādevamahaṃ brahman vaivasvatavadhodyataḥ |gacchāmi dakṣiṇāmāśāṃ yatra sūryātmajo nṛpaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें