वाल्मीकि रामायण 7.20.9
तैस्तैरनिष्टोपगमैरजस्रं यत्र कुत्र कः ।मतिमान्मानुषे लोके युद्धेन प्रणयी भवेत्॥
taistairaniṣṭopagamairajasraṃ yatra kutra kaḥ |matimānmānuṣe loke yuddhena praṇayī bhavet ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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