वाल्मीकि रामायण 7.24.1
निवर्तमानः संहृष्टो रावणस्सुदुरात्मवान् ।जह्रे पथि नरेन्द्रर्षिदेवगन्धर्वकन्यकाः॥
nivartamānaḥ saṃhṛṣṭo rāvaṇassudurātmavān |jahre pathi narendrarṣidevagandharvakanyakāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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