वाल्मीकि रामायण 7.26.15
दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गी मन्दारकृतमूर्धजा ।दिव्योत्सवकृतारम्भा पूर्णचन्द्रनिभानना॥
divyacandanaliptāṅgī mandārakṛtamūrdhajā |divyotsavakṛtārambhā pūrṇacandranibhānanā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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