वाल्मीकि रामायण 7.26.60
श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम् ।नारीषु मैथुने भावं नाकामास्वभ्यरोचयत्॥
śrutvā tu sa daśagrīvastaṃ śāpaṃ romaharṣaṇam |nārīṣu maithune bhāvaṃ nākāmāsvabhyarocayat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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