वाल्मीकि रामायण 7.30.21
अमरेन्द्र मया बह्व्यः प्रजाः सृष्टास्तथा प्रभो ।एकवर्णाः समाभाषा एकरूपाश्च सर्वशः॥
amarendra mayā bahvyaḥ prajāḥ sṛṣṭāstathā prabho |ekavarṇāḥ samābhāṣā ekarūpāśca sarvaśaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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