वाल्मीकि रामायण 7.31.26
नर्मदादर्शजं हर्षमाप्तवान् राक्षसाधिपः ।उवाच सचिवांस्तत्र सलीलं शुकसारणौ॥
narmadādarśajaṃ harṣamāptavān rākṣasādhipaḥ |uvāca sacivāṃstatra salīlaṃ śukasāraṇau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें