वाल्मीकि रामायण 7.31.3
राजा वा राजमात्रो वा किं तदा नात्र कश्चन ।धर्षणं यत्र न प्राप्तो रावणो राक्षसेश्वरः॥
rājā vā rājamātro vā kiṃ tadā nātra kaścana |dharṣaṇaṃ yatra na prāpto rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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