वाल्मीकि रामायण 7.31.39
तत्र स्नात्वा च विधिवज्जप्त्वा जप्यमनुत्तमम् ।नर्मदासलिलात्तस्मादुत्ततार स रावणः॥
tatra snātvā ca vidhivajjaptvā japyamanuttamam |narmadāsalilāttasmāduttatāra sa rāvaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें