वाल्मीकि रामायण 7.32.5
कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् ।कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति॥
kārtavīryabhujāsaktaṃ tajjalaṃ prāpya nirmalam |kūlopahāraṃ kurvāṇaṃ pratisrotaḥ pradhāvati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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