वाल्मीकि रामायण 7.34.27
अपक्षिगणसम्पातान्वानरेन्द्रो महाजवः ।क्रमशः सागरान्सर्वान्सन्ध्याकालमवन्दत॥
apakṣigaṇasampātānvānarendro mahājavaḥ |kramaśaḥ sāgarānsarvānsandhyākālamavandata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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