वाल्मीकि रामायण 7.34.32
तत्रापि सन्ध्यामन्वास्य वासविः सहरीश्वरः ।किष्किन्धामभितो गृह्य रावणं पुनरागमत्॥
tatrāpi sandhyāmanvāsya vāsaviḥ saharīśvaraḥ |kiṣkindhāmabhito gṛhya rāvaṇaṃ punarāgamat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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