वाल्मीकि रामायण 7.36.2
चलकुण्डलमौलिस्रक्तपनीयविभूषणः ।पादयोर्न्यपतद्वायुस्तिस्रोपस्थाय वेधसे॥
calakuṇḍalamaulisraktapanīyavibhūṣaṇaḥ |pādayornyapatadvāyustisropasthāya vedhase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें