वाल्मीकि रामायण 7.36.33
यथा केसरिणा त्वेष वायुना सो ऽञ्जनासुतः ।प्रतिषिद्धो ऽपि मर्यादां लङ्घयत्येव वानरः॥
yathā kesariṇā tveṣa vāyunā so 'ñjanāsutaḥ |pratiṣiddho 'pi maryādāṃ laṅghayatyeva vānaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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