वाल्मीकि रामायण 7.38.12
लक्ष्मणेनानुयात्रेण पृष्ठतो ऽनुगमिष्यते ।धनमादाय विपुलं रत्नानि विविधानि च॥
lakṣmaṇenānuyātreṇa pṛṣṭhato 'nugamiṣyate |dhanamādāya vipulaṃ ratnāni vividhāni ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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