वाल्मीकि रामायण 7.38.25
भवन्तश्च समानीता भरतेन महात्मना ।श्रुत्वा जनकराजस्य काननात्तनयां हृताम्॥
bhavantaśca samānītā bharatena mahātmanā |śrutvā janakarājasya kānanāttanayāṃ hṛtām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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