वाल्मीकि रामायण 7.38.5
तद्भवान्स्वपुरं यातु रत्नान्यादाय पार्थिव ।भरतश्च सहायार्थं पृष्ठतस्ते ऽनुयास्यति॥
tadbhavānsvapuraṃ yātu ratnānyādāya pārthiva |bharataśca sahāyārthaṃ pṛṣṭhataste 'nuyāsyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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