वाल्मीकि रामायण 7.39.10
मणिमुक्ताप्रवालांस्तु दास्यो रूपसमन्विताः ।अजाविकांश्च विविधान् रथांस्तु विविधान्ददुः॥
maṇimuktāpravālāṃstu dāsyo rūpasamanvitāḥ |ajāvikāṃśca vividhān rathāṃstu vividhāndaduḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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