वाल्मीकि रामायण 7.39.12
आगम्य च पुरीं रम्यामयोध्यां पुरुषर्षभाः ।तानि रत्नानि चित्राणि रामाय समुपाहरन्॥
āgamya ca purīṃ ramyāmayodhyāṃ puruṣarṣabhāḥ |tāni ratnāni citrāṇi rāmāya samupāharan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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