वाल्मीकि रामायण 7.39.4
भरतेन वयं पश्चात्समानीता निरर्थकम् ।हता हि राक्षसाः क्षिप्रं पार्थिवैः स्युर्न संशयः॥
bharatena vayaṃ paścātsamānītā nirarthakam |hatā hi rākṣasāḥ kṣipraṃ pārthivaiḥ syurna saṃśayaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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