वाल्मीकि रामायण 7.39.8
यथापुराणि ते गत्वा रत्नानि विविधान्यथ ।रामस्य प्रियकामार्थमुपहारान् नृपा ददुः॥
yathāpurāṇi te gatvā ratnāni vividhānyatha |rāmasya priyakāmārthamupahārān nṛpā daduḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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