वाल्मीकि रामायण 7.4.2
ततः शिरः कम्पयित्वा त्रेताग्निसमविग्रहम् ।तमगस्त्यं मुहुर्दृष्ट्वा स्मयमानो ऽभ्यभाषत॥
tataḥ śiraḥ kampayitvā tretāgnisamavigraham |tamagastyaṃ muhurdṛṣṭvā smayamāno 'bhyabhāṣata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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