वाल्मीकि रामायण 7.48.20
प्रदक्षिणं च तां कृत्वा रुदन्नेव महास्वनः ।ध्यात्वा मुहूर्तं तामाह किं मां वक्ष्यसि शोभने॥
pradakṣiṇaṃ ca tāṃ kṛtvā rudanneva mahāsvanaḥ |dhyātvā muhūrtaṃ tāmāha kiṃ māṃ vakṣyasi śobhane ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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