वाल्मीकि रामायण 7.49.24
मुहुर्मुहुश्च वैदेहीं प्रणिधाय महायशाः ।स्वमाश्रमं शिष्यवृतः पुनरायान्महातपाः॥
muhurmuhuśca vaidehīṃ praṇidhāya mahāyaśāḥ |svamāśramaṃ śiṣyavṛtaḥ punarāyānmahātapāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें